हार्ट अटैक या दिल की बीमारी का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के मन में सीने में दर्द, घबराहट और सांस फूलने जैसे लक्षण आते हैं। लेकिन हर व्यक्ति में हृदय की समस्या इसी तरह सामने आए, यह जरूरी नहीं है। कुछ लोगों में हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में परेशानी होने के बावजूद कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देता। इसे साइलेंट इस्किमिया कहा जाता है।
इस स्थिति में हृदय की मांसपेशियों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, लेकिन मरीज को सामान्य तौर पर महसूस होने वाला सीने का दर्द नहीं होता। यही वजह है कि कई बार समस्या का पता नियमित स्वास्थ्य जांच, ईसीजी या किसी दूसरी बीमारी की जांच के दौरान चलता है।
दर्द क्यों महसूस नहीं होता?
जब कोरोनरी आर्टरी में फैट और कोलेस्ट्रॉल जमा होने से रक्त का प्रवाह प्रभावित होता है, तो हृदय को ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। सामान्य स्थिति में शरीर इसे सीने में दर्द या दबाव के रूप में महसूस करता है। हालांकि कुछ लोगों में दर्द महसूस करने की क्षमता कम हो सकती है।
विशेष रूप से लंबे समय से डायबिटीज वाले मरीजों में नसों को नुकसान पहुंचने के कारण हार्ट से मिलने वाले दर्द के संकेत कम महसूस हो सकते हैं। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि बीमारी हल्की है। बिना लक्षण के रहने वाली इस स्थिति में भी हार्ट अटैक और हृदय की मांसपेशियों को नुकसान का खतरा बना रह सकता है।
किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?
साइलेंट इस्किमिया का खतरा उन लोगों में अधिक हो सकता है जिनमें हृदय रोग के जोखिम कारक मौजूद हैं। इनमें शामिल हैं:
- डायबिटीज
- हाई ब्लड प्रेशर
- बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल
- मोटापा
- धूम्रपान
- शारीरिक गतिविधि की कमी
- लंबे समय तक तनाव
- परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास
- बढ़ती उम्र
पुरुषों में उम्र बढ़ने के साथ जोखिम बढ़ता है, जबकि महिलाओं में मेनोपॉज के बाद हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है।
सिर्फ सीने का दर्द ही संकेत नहीं
कुछ मामलों में शरीर दूसरे संकेतों के जरिए भी समस्या का इशारा कर सकता है। बिना वजह लगातार थकान, सामान्य काम या सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलना, चक्कर, असामान्य पसीना, अपच जैसा महसूस होना या जबड़े, पीठ और कंधे में असहजता जैसे लक्षणों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
खासकर अगर ऐसे लक्षण बार-बार हों या किसी व्यक्ति में डायबिटीज, ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्या पहले से मौजूद हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
जांच से कैसे चलता है पता?
साइलेंट इस्किमिया की जांच हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती। डॉक्टर मरीज की उम्र, मेडिकल हिस्ट्री और जोखिम कारकों को देखते हुए जांच तय कर सकते हैं। इनमें ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच के साथ ईसीजी, ट्रेडमिल टेस्ट, इकोकार्डियोग्राफी या कुछ मामलों में सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी जैसी जांच शामिल हो सकती है।
हालांकि केवल उम्र के आधार पर हर व्यक्ति को हार्ट की सभी जांच कराने की जरूरत नहीं होती। कौन-सी जांच जरूरी है, इसका फैसला डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार करते हैं।
बचाव में लाइफस्टाइल की बड़ी भूमिका
हृदय को स्वस्थ रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद और वजन को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है। इसके साथ धूम्रपान से दूरी और डायबिटीज, ब्लड प्रेशर व कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखना भी जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लक्षण न होना हमेशा बीमारी न होने की गारंटी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति में हार्ट डिजीज के कई जोखिम कारक हैं, तो समय-समय पर डॉक्टर से स्वास्थ्य संबंधी सलाह लेना फायदेमंद हो सकता है।
अगर अचानक सीने में दबाव या दर्द, तेज सांस फूलना, ठंडा पसीना, बेहोशी या जबड़े, पीठ अथवा हाथ में दर्द जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो इसे गैस या सामान्य थकान समझकर इंतजार नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।







