यूपी में गर्मी ने अभी से अपना खतरनाक रूप दिखाना शुरू कर दिया है। मार्च में ही मई जैसी गर्मी का एहसास होने लगा है। ताजनगरी आगरा में अधिकतम तापमान 37 डिग्री को पार कर गया है। यह सामान्य से अधिक है। इस माह औसत तापमान 32-33 डिग्री सेल्सियस ही रहता है। गर्मी के जल्द शुरू होने से मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि इस बार हीट वेव (लू) के दिन जल्द आ सकते हैं और बढ़ भी सकते हैं। तापमान में जल्द बढ़ोत्तरी के कारण पर्यावरणीय, कृषि, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव सामने आ सकते हैं।
रविवार को अधिकतम तापमान 37.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। दिन में बेहद गर्मी रही, तेज धूप खिलने से त्वचा पर असर देखा गया। जबकि न्यूनतम तापमान सामान्य से 3.4 डिग्री अधिक होकर 17.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इस कारण रात में भी गर्मी का एहसास हुआ। आर्द्रता का अधिकतम प्रतिशत 78 रह गया है। इसलिए नमी की भी कमी होने लगी है।
जल्द गर्मी का स्वास्थ्य पर सीधा और नकारात्मक असर पड़ता है। मार्च में तेज गर्मी से डिहाइड्रेशन और थकान बढ़ सकती है। लोग सुस्त महसूस करेंगे। तापमान और बढ़ने पर हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे मौसम में बुजुर्ग, बच्चे और खुले में काम करने वाले लोगों पर अधिक असर हो सकता है। यूवी इंडेक्स भी 6-7 तक पहुंच सकता है।
एयर कंडीशनर, कूलर, पंखे जल्दी चलने शुरू हो गए हैं। इससे बिजली की खपत और मांग दोनों बढ़ने वाली हैं। तेज गर्मी में पानी की खपत भी अच्छी खासी होती है, इसलिए पानी की दिक्कत भी हो सकती है। चूंकि ठंडक वाले उपकरण जल्द शुरू हो गए हैं इसलिए बिजली का बिल भी अधिक आएगा और यह सिलसिला लंबा चलेगा। लोगों की जेब पर असर पड़ेगा।
उत्तर भारत में तेज गर्मी अप्रैल-मई में शुरू होती है। लेकिन मौजूदा तापमान के मुताबिक गर्मी जल्द शुरू हुई है। इससे हीटवेव का मौसम लंबा हो सकता है। मई-अप्रैल के दौरान सामान्य से ज्यादा हीटवेव वाले दिन हो सकते हैं। आम तौर पर पांच से छह दिन लू चलती है। लेकिन इस बार यह 10 से 12 दिनों की हो सकती है। ऐसे में बाहर निकलना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
गेहूं जैसी रबी की फसलों में इसी माह दाने अंतिम रूप से भरते हैं। जल्द गर्मी के कारण यह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाएंगे। यानि दानों की मोटाई कम रह जाएगी। विशेषज्ञों के मुताबिक इस चरण में तापमान बढ़ने से फसल जल्दी पक जाती है। दाना छोटा रह जाता है। ऐसा होने पर उत्पादन कम रह जाएगा और किसानों को आर्थिक नुकसान हो सकता है। गेहूं का दाम भी बढ़ सकते हैं।





