हिंदू धर्म में पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष पितरों के लिए पूजा-पाठ व अनुष्ठान आदि करने का समय होता है। इस दौरान पूजा-पाठ के बाद पितरों के लिए भोजन बनाया जाता है, लेकिन पितरों को भोग लगाने से पहले भोजन को चार भाग में बांटा जाता है, जो क्रमश: कौआ, गाय, कुत्ता और कन्या के लिए होता है।
इसका वर्णन गरूड़ पुराण में भी मिलता है। यदि आप श्राद्ध पक्ष में कौए को भोजन कराएं और वह ग्रहण कर ले तो माना जाता है कि आपके पूर्वज प्रसन्न हैं और वो अपने वंशजों को आशीर्वाद दे रहे हैं। पितृ पक्ष में पूर्वजों के तर्पण और पिंडदान के साथ कौए को भोजन कराना भी कर्मकांड का एक हिस्सा माना जाता है।
पशु-पक्षियों को भोजन कराने का क्या है कारण
यह कर्मकांड वसुधैव कुटुंबकम की भावना में निहित है। किसी भी पूजा में 84 लाख देवताओं का आवाहन किया जाता है। सनातन धर्म में वायु को भी पूजा जाता है, अग्नि को भी पूजा जाता है, आकाश को भी पूजा जाता है, जल को भी पूजा जाता है और पृथ्वी को भी पूजा जाता है। इस प्रकार से देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। गाय को पवित्रता का सूचक माना जाता है। कुत्ता स्वांग भक्ति के लिए, काग और कौआ मलिंता निवारक हैं। कन्या या अभ्यागत को भोग अतिथि के लिए देते हैं। इन सभी को भोजन के रूप में समाहित किया जाता है।
विष्णु पुराण में श्राद्ध पक्ष में भक्ति और विनम्रता से यथाशक्ति भोजन कराने की बात कही गई है। कौआ सहित अन्य पशुओं को पितरों का प्रतीक मानकर श्राद्ध पक्ष के १६ दिनों तक भोजन कराया जाता है। माना जाता है कि इनके रूप में हमारे पूर्वज ही भोजन करते हैं। भोजन कराने से सभी तरह का पितृ और कालसर्प दोष दूर होता है। गरुड़ पुराण के अनुसार एक बार यम देवता ने कौए को वरदान दिया कि जो भी उसे भोजन कराएगा वो भोजन सीधा पूर्वजों को प्राप्त होगा। यही नहीं इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति भी मिलेगी।कौआ और पूर्वजों को भोजन कराने के पीछे की कहानी
कहा जाता है कि इन पशु-पक्षियों के रूप में पूर्वज ही पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों पर प्रसन्न होकर भोजन ग्रहण करते हैं। इसके पीछे रामायण की एक कथा का भी वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार, एक बार एक कौवे ने माता सीता के पैरों में चोंच मार दी जिसे देखकर श्री राम ने अपने बाण से उसकी आंख को क्षति पहुंचा दी।
कौवे को जब इसका पछतावा हुआ तो उसने श्रीराम से क्षमा मांगी और भाव विभोर होकर श्री राम ने आशीर्वाद दिया कि कलयुग में जो व्यक्ति सबसे पहले कौए को भोजन कराएगा उसके पूर्वज सदैव प्रसन्न होंगे। उसी समय से यह परंपरा चली आ रही है।
कौवों को खाना खिलाना पूर्वजों के प्रति सम्मान दिखाने और उनकी आत्मा को शांति दिलाने का एक अहम हिस्सा भी माना जाता है।






