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‘हर बच्चे को बराबर मौका मिले’—NEET विवाद पर सेलिना जेटली का भावुक पोस्ट

नई दिल्ली: फिल्म अभिनेत्री सेलिना जेटली ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर लिखा है। उन्होंने नीट पेपर लीक-2026 के मामले में प्रदर्शन कर रहे युवाओं को लेकर सरकार से अपील की है। उन्होंने बड़ा रास्ता सुझाया है। साथ ही अपनी सरकारी स्कूल वाली कहानी भी बताई है। गुरुवार को सेलिना जेटली की ओर से किए गए इस पोस्ट को कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर ने भी री-पोस्ट किया है। इस पोस्ट के काफी समय बाद गुरुवार रात ही सोनम वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ दिया। इसके बाद अभिजीत दिपके ने 24 जुलाई को देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। दिपके ने कहा है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक कॉकरोच जनता पार्टी का जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा।

सेलिना जेटली ने लिखा-‘कलम हमेशा तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है। हमारे देश के भविष्य पर बातचीत होनी चाहिए, टकराव नहीं।’ उन्होंने आगे कहा-‘भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने जो चुनौतियां हैं, वे न तो कल शुरू हुईं और न ही किसी एक सरकार या राजनीतिक पार्टी की वजह से हैं। ये दशकों से चली आ रही हैं। अब एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने का समय आ गया है जहां हर बच्चे को सफल होने का बराबर मौका मिले।’

लिना जेटली ने लिखा-जब किसी छात्र को मौका मिलता है, तो दुनिया को डॉ. टेसी थॉमस, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम या सुंदर पिचाई जैसा कोई अग्रणी, इनोवेटर, वैज्ञानिक, नेता या दूरदर्शी व्यक्ति मिलता है। लेकिन कितने ही असाधारण युवा दिमाग कभी सामने नहीं आ पाते क्योंकि उन तक मौका ही नहीं पहुंच पाता?

  • सेलिना जेटली ने एक्स पर अपनी कहानी बयां की। उन्होंने लिखा-‘मैंने उत्तराखंड, कश्मीर, अरुणाचल, हिमाचल और असम के छोटे-छोटे कस्बों में पली-बढ़ी हूं और मैंने 13 अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई की है, जिनमें से ज्यादातर सरकारी स्कूल थे।’
  • उन्होंने लिखा-‘मैं खुशकिस्मत थी कि मुझे ऐसा घर मिला जहां मेरे माता-पिता ने यह पक्का किया कि मुझे अच्छी शिक्षा मिले। लेकिन जब मैं स्कूल जाती थी, तो हकीकत अक्सर बहुत अलग होती थी। कभी छत नहीं होती थी, तो कभी शिक्षक नहीं होते थे। कई साल ऐसे भी बीते जब पूरे विषय के लिए हमारे पास कोई शिक्षक ही नहीं था।’
  • सेलिना जेटली ने कहा-कुछ शिक्षक स्कूल में पढ़ाने से मना कर देते थे। इसके बजाय, हमसे उम्मीद की जाती थी कि हम स्कूल के बाद उनके घर जाकर पैसे देकर कोचिंग लें और वह सीखें जो क्लासरूम में पढ़ाया जाना चाहिए था। मैं उन क्लासरूम के कई ऐसे छात्रों को जानती हूँ जो सही मौके मिलने पर दुनिया भर में अपना नाम रोशन कर सकते थे।
  • उन्होंने लिखा-एक समय ऐसा भी आया जब मेरे फौजी पिता और मेरे माता-पिता कई यूनिवर्सिटीज द्वारा मांगे जाने वाले 15–20 लाख रुपये के डोनेशन का खर्च नहीं उठा सकते थे। शायद मेरा सफर कुछ और होता। फिर भी, मैं आज जो कुछ भी हूं और जो कुछ भी बन पाई हूं, उसके लिए मैं बहुत आभारी हूं। इसीलिए मैं आज के छात्रों के दर्द और निराशा को समझती हूं।

सेलिना जेटली ने लिखा-‘शांतिपूर्ण विरोध तब होता है जब बातचीत नाकाम हो जाती है। लेकिन बड़ी-बड़ी लड़ाइयां भी आखिर में बातचीत से ही खत्म होती हैं। तो इंतजार क्यों? आइए, अब बातचीत का रास्ता चुनें। क्योंकि भारत का सबसे बड़ा संसाधन कभी भी उसके खनिज या बाजार नहीं रहे हैं। इसके बच्चे ही हमेशा से इसकी सबसे बड़ी ताकत रहे हैं।’

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