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‘संकेत साहित्य रत्न’ से सम्मानित हुए डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड

संकेत साहित्य समिति के 46वें स्थापना दिवस पर परिचर्चा और काव्य गोष्ठी, डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड ‘संकेत साहित्य रत्न’ से सम्मानित

रायपुर। संकेत साहित्य समिति के 46वें स्थापना दिवस के अवसर पर शुक्रवार को रायपुर के वृंदावन हॉल में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजन हुआ। कार्यक्रम में राजभाषा हिंदी की वर्तमान स्थिति, उसकी भूमिका और भविष्य की संभावनाओं पर परिचर्चा के साथ सरस काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में कोलकाता से आए भाषाविद् एवं साहित्यकार डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड मुख्य अतिथि रहे, जबकि छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने अध्यक्षता की।

आयोजन के दौरान डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड को साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए ‘संकेत साहित्य रत्न’ सम्मान प्रदान किया गया। समिति की ओर से अतिथियों का अंगवस्त्र और श्रीफल भेंट कर अभिनंदन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की पूजा-अर्चना से हुई। स्वागत उद्बोधन में संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने हिंदी के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी देश की विविध भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण भाषा है।

अध्यक्षीय संबोधन में शशांक शर्मा ने कहा कि संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के सामने कोई बड़ा संकट नहीं है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अंग्रेजी को मिलने वाली प्राथमिकता हिंदी के लिए चुनौती जरूर है। उन्होंने साहित्य और जनसंचार में सरल एवं सहज हिंदी के प्रयोग को समय की जरूरत बताया।

मुख्य अतिथि डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड ने हिंदी के विकास और उसके ऐतिहासिक महत्व पर विचार रखते हुए कहा कि हिंदी महज संवाद का माध्यम नहीं है। यह भारतीय समाज की स्मृतियों, सांस्कृतिक चेतना, संवेदनाओं और सामूहिक विचारों को अभिव्यक्त करने वाली भाषा भी है। उन्होंने राजभाषा हिंदी को केंद्र में रखकर आयोजित कार्यक्रम को साहित्यिक संवाद की सार्थक पहल बताया।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर ने भाषा को संस्कृति और चेतना से जोड़ते हुए अपने विचार रखे। व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने हिंदी के बढ़ते वैश्विक प्रभाव पर चर्चा की। वहीं डॉ. रेशमा अंसारी ने बदलते तकनीकी परिवेश में हिंदी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से हिंदी के विस्तार की संभावनाओं की चर्चा की। उन्होंने देवनागरी लिपि के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता भी बताई।

इसके बाद पल्लवी झा के संचालन में काव्य गोष्ठी हुई। प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंचे कवियों और रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को साहित्यिक रस से सराबोर किया। गोष्ठी में डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड, डॉ. चितरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ. रेशमा अंसारी, मीर अली ‘मीर’, राजेश जैन ‘राही’, उदयभान सिंह चौहान, सुरेंद्र रावल, डॉ. दीनदयाल साहू, मधु मार्तंड, संजीव ठाकुर, डॉ. रविंद्र सरकार, सुषमा पटेल, हरीश कोटक, राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, गणेशदत्त झा, यशवंत यदु, राजेंद्र रायपुरी, विवेक राहटगांवकर, एच.एल. चंद्राकर, दिलीप वरवंडकर, डॉ. सिद्धार्थ श्रीवास्तव, राजेंद्र ओझा, कुमार जगदली और नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा सहित अनेक साहित्यकारों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के समापन पर संयोजक हरीश कोटक ने अतिथियों, साहित्यकारों और सभी रचनाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया। स्थापना दिवस का यह आयोजन हिंदी भाषा, साहित्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति के प्रति साहित्यकारों की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता नजर आया।

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