*बांग्लादेश में हालिया दिनों में मज़हब के नाम पर अल्पसंख्यक तबक़ों के ख़िलाफ़ भीड़ द्वारा हिंसा, मोब लिंचिंग और बेगुनाह इंसानों को ज़िंदा जलाने जैसी अमानवीय घटनाओं का सामने आना निहायत ही अफ़सोसनाक, शर्मनाक और पूरी इंसानियत को झकझोर देने वाला अमल है।**इस तरह की बर्बरता न किसी मज़हब की तालीम हो सकती है और न ही किसी सभ्य समाज की पहचान।**इस्लाम कभी भी कमज़ोरों, अल्पसंख्यकों या बेगुनाह इंसानों पर ज़ुल्म की इजाज़त नहीं देता।**जो लोग ऐसी घिनौनी और कायराना हरकतों में शामिल हैं, वे न इंसानियत के पैरोकार हैं और न ही इस्लाम की सच्ची रूह और उसकी बुनियादी तालीम को समझने वाले। हम यह बात पूरी ज़िम्मेदारी और वज़न के साथ कहना चाहते हैं कि भारत का हर अमन-पसंद मुसलमान इस ज़ुल्म, नफ़रत और हिंसा के ख़िलाफ़ है और अपने हिंदू भाइयों सहित तमाम पीड़ित अल्पसंख्यक समुदायों के साथ पूरी मज़बूती और एकजुटता के साथ खड़ा है।**हम भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से पुरज़ोर मांग करते हैं कि:**•बांग्लादेश सरकार पर कूटनीतिक दबाव बनाकर दोषियों को फ़ौरन गिरफ़्तार किया जाए और उन्हें सख़्त सज़ा दी जाए।**•अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के ज़रिये इन घटनाओं की निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच कराई जाए।**•पीड़ित परिवारों की हिफ़ाज़त, मुआवज़ा, पुनर्वास और इंसाफ़ को यक़ीनी बनाया जाए।**•हम मुस्लिम समाज के उन तमाम बड़े ओलेमा-ए-किराम से भी अपील करते हैं, जिनकी बात को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुना और माना जाता है, कि वे भी इन ज़ुल्मी और अमानवीय घटनाओं के ख़िलाफ़ खुलकर और पूरी ताक़त के साथ अपनी आवाज़ बुलंद करें,**हम यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि कुछ कट्टरपंथी तत्व इन घटनाओं के बहाने भारत में आपसी भाईचारे को नुकसान पहुँचाने और तनाव फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे तमाम लोगों के लिए हमारा साफ़ और दो-टूक संदेश है—**हम ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ, ख़ुद ज़ालिम न बनें।**इंसाफ़ की लड़ाई नफ़रत से नहीं, बल्कि अमन, समझदारी और इंसानियत से लड़ी जाती है।**हम देशवासियों से अपील करते हैं कि ऐसे नाज़ुक हालात में अफ़वाहों, उकसावे और नफ़रत भरे प्रचार से बचते हुए। अमन, इंसाफ़ और इंसानियत को मज़बूत करें — क्योंकि यही हर मज़हब की बुनियादी तालीम और सच्चा पैग़ाम है।**हम बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हुई इन अमानवीय और कायराना घटनाओं की कड़े अल्फ़ाज़ में निंदा करते हैं और हर सतह पर इंसाफ़ की मांग दोहराते हैं।*





