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आपदा से बचाव का मंत्र: समय रहते तैयारी, कम होगा जान-माल का नुकसान

नई दिल्ली। बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात और दूसरी प्राकृतिक आपदाएं दुनिया के सामने लगातार चुनौती बनी हुई हैं। नेपाल में बाढ़ और पनामा में भूकंप जैसी घटनाएं एक बार फिर यह याद दिलाती हैं कि आपदा आने से पहले तैयारी कितनी जरूरी है। हर साल बड़ी संख्या में लोग आपदाओं की वजह से जान-माल, घर, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का नुकसान झेलते हैं।

इसी चुनौती को देखते हुए हर साल 13 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस (International Day for Disaster Risk Reduction) मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों और सरकारों को आपदा के संभावित जोखिमों के प्रति जागरूक करना और नुकसान को कम करने के लिए बेहतर तैयारी को बढ़ावा देना है।

आपदा के बाद राहत से ज्यादा जरूरी पहले की तैयारी

आपदा प्रबंधन का मतलब केवल घटना के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं है। जोखिम की पहचान, समय रहते चेतावनी, सुरक्षित स्थानों की तैयारी, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मजबूत बुनियादी ढांचा आपदा से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार आपदा का सबसे पहला और गंभीर असर स्थानीय समुदायों पर पड़ता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और समुदायों की तैयारी मजबूत होना बेहद जरूरी है।

सेंडाई फ्रेमवर्क ने तय की वैश्विक दिशा

2015 में जापान के सेंडाई शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के तीसरे विश्व सम्मेलन के बाद सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन 2015-2030 को वैश्विक स्तर पर आपदा जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण ढांचे के तौर पर अपनाया गया।

इसका मकसद आपदाओं के कारण होने वाली मौतों, प्रभावित लोगों की संख्या और आर्थिक नुकसान को कम करना है। इसमें प्राकृतिक खतरों के साथ पर्यावरणीय, तकनीकी और जैविक जोखिमों से निपटने पर भी जोर दिया गया है।

सेंडाई फ्रेमवर्क यह भी स्पष्ट करता है कि आपदा जोखिम कम करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकारों की है, लेकिन इसमें स्थानीय प्रशासन, निजी क्षेत्र, विशेषज्ञ संस्थानों और आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है।

स्थानीय प्रशासन की भूमिका सबसे अहम

किसी बड़े संकट के समय सबसे पहले स्थानीय स्तर की व्यवस्थाएं ही सक्रिय होती हैं। इसलिए ग्राम पंचायत, नगर निकाय और जिला प्रशासन की आपदा तैयारी मजबूत होना जरूरी है।

ग्राम पंचायत और स्थानीय संस्थाएं कई स्तरों पर काम कर सकती हैं:

  • ग्रामीणों को आपदा के संभावित खतरों और सुरक्षा उपायों की जानकारी देना।
  • स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन और निकासी की योजना तैयार करना।
  • बाढ़, भूकंप या अन्य संकट की स्थिति में लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था करना।
  • प्राथमिक चिकित्सा और जरूरी राहत सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • आपदा के बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण में प्रशासन का सहयोग करना।

जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है जोखिम

जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में मौसम से जुड़ी चरम घटनाओं की चुनौती बढ़ रही है। भारी बारिश, बाढ़, सूखा, गर्मी और चक्रवात जैसी घटनाएं समुदायों और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ाती हैं।

ऐसे में आपदा जोखिम कम करने को केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया के तौर पर देखने के बजाय विकास योजनाओं का हिस्सा बनाना जरूरी है। सड़क, पुल, अस्पताल, स्कूल और आवास जैसी परियोजनाओं में आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर योजना बनाने से भविष्य के नुकसान को कम किया जा सकता है।

चेतावनी प्रणाली और जनभागीदारी पर जोर

आपदा के दौरान कुछ मिनट या घंटे की पूर्व चेतावनी भी कई लोगों की जान बचा सकती है। इसलिए प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम, स्थानीय स्तर पर सूचना पहुंचाने की व्यवस्था और लोगों को उसका सही इस्तेमाल सिखाना बेहद महत्वपूर्ण है।

हाल के वर्षों में आपदा से होने वाली मौतों को कम करने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की दिशा में प्रगति हुई है। इसके बावजूद प्रभावित आबादी, आर्थिक नुकसान और बुनियादी ढांचे पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए चुनौती अभी भी बड़ी है।

सिर्फ सरकार नहीं, हर नागरिक की जिम्मेदारी

आपदा जोखिम न्यूनीकरण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि आपदा को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसकी तैयारी करके उसके असर को काफी कम किया जा सकता है। स्थानीय प्रशासन की मजबूत तैयारी, वैज्ञानिक चेतावनी प्रणाली और जागरूक नागरिक मिलकर किसी भी आपदा के दौरान जान-माल के नुकसान को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

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