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रूस से डीजल समझौते पर ट्रंप को झटका! अपनी ही पार्टी के सांसदों ने घेरा

वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रूस से जुड़े डीजल समझौते को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने आशंका जताई है कि ट्रंप का मौजूदा कदम अमेरिकी कानून का उल्लंघन कर सकता है। वहीं, सीनेट में रिपब्लिकन व्हिप जॉन बारासो ने राष्ट्रपति के फैसले का बचाव करते हुए इसे रूस पर दबाव बनाने की रणनीति बताया है।

यह विवाद रविवार को अमेरिकी टीवी कार्यक्रमों NBC के ‘Meet the Press’ और CBS के ‘Face the Nation’ में सामने आया। ट्रंप को जल्द ही यह तय करना है कि रूसी तेल के बड़े खरीदारों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई या अतिरिक्त शुल्क लगाया जाए या नहीं।

ट्रंप कानून तोड़ रहे हैं? टिलिस ने जताई आशंका

NBC की पत्रकार क्रिस्टन वेल्कर ने सीनेटर थॉम टिलिस से सवाल किया कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप उस अमेरिकी कानून का उल्लंघन कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य रूसी तेल की खरीद और रूस की ऊर्जा आय से निपटना है।

टिलिस ने कहा कि ऐसा हो सकता है। उनके मुताबिक, यह मानने के लिए पर्याप्त आधार हैं कि राष्ट्रपति का मौजूदा कदम कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है।

नॉर्थ कैरोलिना के रिपब्लिकन सीनेटर ने कहा कि रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए कांग्रेस में जिस प्रतिबंध विधेयक को भारी समर्थन मिला था, उसमें सीनेटरों की स्थिति काफी स्पष्ट थी। उन्होंने याद दिलाया कि संबंधित विधेयक को सीनेट में करीब 86 वोट मिले थे।

टिलिस के मुताबिक, राष्ट्रपति के हालिया कदम और बयान उस विधायी भावना के विपरीत दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि रूस से जुड़े डीजल समझौते से रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कांग्रेस की कोशिशों को नुकसान पहुंच सकता है।

छह अन्य सीनेटरों के साथ ट्रंप के खिलाफ बयान

टिलिस ने रविवार को छह अन्य सीनेटरों के साथ एक संयुक्त बयान पर भी हस्ताक्षर किए। इस बयान का नेतृत्व सीनेट की विदेश संबंध समिति की वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य जीन शाहीन ने किया।

बयान में राष्ट्रपति ट्रंप से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने और प्रशासन की नीति में तत्काल बदलाव करने की मांग की गई।

इस बयान पर रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स, लिसा मुर्कोव्स्की और जॉन कर्टिस के साथ डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल और रॉन वाइडेन ने भी हस्ताक्षर किए।

बारासो ने किया ट्रंप का बचाव

दूसरी ओर, CBS के ‘Face the Nation’ कार्यक्रम में रिपब्लिकन सीनेट व्हिप जॉन बारासो ने राष्ट्रपति ट्रंप का बचाव किया।

एंकर मार्गरेट ब्रेनन ने बारासो से पूछा कि जब राष्ट्रपति को रूसी तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई पर जल्द फैसला लेना है, तो क्या उनका मौजूदा कदम उस कानून को कमजोर नहीं करता, जिसके पक्ष में उन्होंने खुद मतदान किया था।

बारासो ने इसका जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस ने यह कानून राष्ट्रपति को अधिक विकल्प और ताकत देने के लिए बनाया था। उनके अनुसार, ट्रंप इन अधिकारों का इस्तेमाल रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बनाने के लिए कर सकते हैं।

बारासो ने इसे रूस पर दबाव बढ़ाने और यूक्रेन युद्ध के लिए दीर्घकालिक समाधान तलाशने की कोशिश का हिस्सा बताया।

क्या है ग्राहम सैंक्शनिंग एक्ट?

विवाद के केंद्र में सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम के नाम से जुड़ा रूस और ईरान प्रतिबंध कानून है। इसकी धारा 113 के तहत राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है, जो रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के बड़े खरीदार हैं और खरीद जारी रखते हैं।

हालांकि, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस व्याख्या को चुनौती दी है। उन्होंने कहा है कि यह दावा गलत है कि ग्राहम कानून रूसी डीजल की खरीद पर सीधे रोक लगाता है।

कानून में राष्ट्रपति को यह अधिकार भी दिया गया है कि यदि वह कांग्रेस को प्रमाणित कर दें कि शुल्क में छूट देना अमेरिकी राष्ट्रीय हित में है, तो वे ऐसी कार्रवाई से छूट दे सकते हैं।

डीजल और कच्चे तेल में फर्क क्यों अहम?

पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह है कि कानून में रूसी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद का उल्लेख है, जबकि डीजल एक रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद है।

यही अंतर ट्रंप प्रशासन के लिए कानूनी आधार बन सकता है। आलोचक हालांकि यह तर्क दे रहे हैं कि रूस से जुड़े ऊर्जा कारोबार को अनुमति देने से प्रतिबंधों की मूल भावना कमजोर होती है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?

हालांकि टिलिस और बारासो ने अपने बयानों में सीधे भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन यह मामला भारत के लिए महत्वपूर्ण है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है और अमेरिकी प्रतिबंध नीति में बदलाव का असर भारतीय तेल कारोबार, रिफाइनिंग और ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है।

अब निगाहें ट्रंप प्रशासन के अगले फैसले पर हैं। अगर अमेरिका रूसी तेल के बड़े खरीदारों पर अतिरिक्त शुल्क या प्रतिबंध लागू करता है, तो भारत समेत कई देशों के लिए रूसी ऊर्जा की खरीद और भुगतान व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

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